ओशो – योगासन के बारे मे

मैं तुमसे कहता हूं, लाख तुम योगासन करो, नहीं पाओगे। हां, कुछ और पाओगे। स्वास्थ्य पाओगे। कम बीमार होओगे। ज्यादा लंबे जीओगे। मगर ज्यादा लंबे जीकर भी क्या करोगे? जीओगे तो यही जीवन, यही गलत जीवन। यह तो कम ही जीना अच्छा है। इसको लंबा जीकर और गलतियां बढ़ाओगे। स्वस्थ रहोगे माना, मगर स्वस्थ रह कर करोगे क्या? और शराब पीओगे। और जुआ खेलोगे। और वेश्यागमन करोगे। और करोगे क्या?

योगासन तुम्हें स्वास्थ्य दे सकता है, लंबी आयु दे सकता है, इसमें कोई दो मत नहीं हैं। क्योंकि सुंदर व्यायाम है; मगर व्यायाम शरीर के पार नहीं जाता। शरीर को मोड़ो-मरोड़ो, ऐसा झुकाओ, वैसा झुकाओ। स्वभावतः शरीर लोचपूर्ण रहेगा, ज्यादा दिन तक युवा रहेगा। मगर युवा होने का करोगे क्या? कुछ न कुछ गलत ही तो करोगे। ठीक करने की दृष्टि कहां से आ जाएगी? क्या तुम सोचते हो योगासन करने से सम्यक दृष्टि का जन्म होगा? वह संभव नहीं है।

और भारत योगासन के नाम पर खूब भटक गया है, खूब भरमाया हुआ है। कोई नाक पर एक अंगुली लगाए हुए सांसें ले रहा है, कोई सिर के बल खड़ा हुआ है। कोई यह बंध साध रहा है, कोई वह बंध साध रहा है, और जिंदगी उनकी इसी में बीत रही है–बंधों के साधने में। और मुक्ति कब साधोगे? ये बंध ही बंध साधते रहोगे! यह देह तो चली जाएगी। फिर चाहे योगासन से पुष्ट हुई हो, चाहे दंड-बैठक से पुष्ट हुई हो और चाहे पाश्चात्य ढंग के व्यायाम से पुष्ट हुई हो, यह देह तो चली जाएगी। इस देह के साथ सब योगासन भी चला जाएगा। कुछ साधो जो मौत के पार तुम्हारे साथ चलेगा!

सांच सांच सो सांच, ओशो

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