ओशो – संन्यास क्या वे ही लोग लेते हैं जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया?

संन्यास क्या वे ही लोग लेते हैं जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया?

और कौन लेगा? संन्यास कोई खिलवाड़ तो नहीं। संन्यास कोई बच्चों का खेल तो नहीं। जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया है, जिन्हें यह बात दिखायी पड़ गयी कि जीवन में दौड़ो कितना ही, पहुंचोगे कहीं भी नहीं; कमाओ कितना ही, अंततः सब कमाना गंवाना सिद्ध होगा। जिन्हें यह दिख गया है कि यहां दूर के ढोल सुहावने हैं, पास आने पर सब व्यर्थ हो जाते हैं; जिन्हें जीवन की मृगमरीचिका का बोध हो गया है, वे ही तो संन्यासी होते हैं। संन्यास का अर्थ ही क्या है? संसार की व्यर्थता का बोध ही संन्यास है।

संन्यास का अर्थ ही इतना है कि जहां हमें कल तक आशा थी, वहां आशा न रही। यह एक रूपांतरण है। जहां-जहां हमने सोचा था सुख है, वहां सुख नहीं है। धन में सोचा, पद में सोचा, प्रतिष्ठा में सोचा, मोह में, मद-मत्सर में सोचा, नहीं है। नहीं है, तब भी तो एक जीवन होगा। संसार में सुख नहीं है, तब एक नए जीवन की शुरुआत होती है–सुख भीतर है, सुख स्वयं में है, सुख आंतरिक संपदा है, स्वभाव है। ….

Es Dhammo Sanantano

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